
शेयर बाजार 322 अंकों की गिरावट के साथ बंद
मुंबई [महामीडिया] शेयर बाजार में आज 3 अप्रैल को गिरावट रही। सेंसेक्स 322 अंक की गिरावट के साथ 76,295 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी में भी 82 अंक की गिरावट रही यह 23,250 के स्तर पर बंद हुआ।
मुंबई [महामीडिया] शेयर बाजार में आज 3 अप्रैल को गिरावट रही। सेंसेक्स 322 अंक की गिरावट के साथ 76,295 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी में भी 82 अंक की गिरावट रही यह 23,250 के स्तर पर बंद हुआ।
भोपाल [ महामीडिया] एक लोक कथा के अनुसार एक आश्रम में एक संत जी के साथ उनके दो शिष्य रहते थे। संत ने दोनों शिष्यों को अच्छी शिक्षा दी थी। एक दिन संत ने दोनों शिष्यों को एक-एक डिब्बे में गेहूँ भरकर दिए और कहा कि मैं तीर्थ यात्रा पर जा रहा हूँ। दो वर्ष पश्चात वापस आऊँगा, तब ये मुझे लौटा देना, किंतु ध्यान रखना ये गेहूँ नष्ट नहीं होना चाहिए। ये बोलकर संत चले गए। एक शिष्य ने वह डिब्बा घर में पूजा वाले स्थान पर रख दिया और रोज उसकी पूजा करने लगा। दूसरे शिष्य ने डिब्बे से गेहूँ निकाले और अपने खेत में उगा दिए। दो वर्ष में थोड़े गेहूँ से उसके पास बहुत सारे गेहूँ हो गए थे। समय पूरा होने पर संत आश्रम आए और उन्होंने शिष्यों से गेहूँ के डिब्बे मँगवाये। पहले शिष्य ने डिब्बा देते हुए कहा कि गुरुजी मैंने आपके गेहुँओं को बहुत सावधानी से रखा है। मैं प्रतिदिन इसकी पूजा करता था। गुरु ने डिब्बा खोल के देखा तो गेहूँ खराब हो चुके थे। उसमें कीड़े लग गए थे। ये देखकर पहला शिष्य लज्जित हो गया। दूसरा शिष्य एक थैला लेकर आया और संत के सामने रखकर बोला कि गुरुजी ये रही आपकी धरोहर। गेहूँ से भरा थैला देखकर संत बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि पुत्र तुम मेरी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए हो। मैंने तुम्हें जो भी ज्ञान दिया है, तुमने उसे अपने जीवन में उतार लिया है और मेरे दिए ज्ञान का सही उपयोग किया है। इसी कारण से तुम्हें गेहूँ को संभालने में सफलता मिल गई है। जब तक हम अपने ज्ञान को डिब्बे में बंद गेहूँ के समान रखेंगे तब तक उससे कोई लाभ नहीं मिलेगा। ज्ञान को अपने आचरण में उतारना चाहिए। दूसरों के साथ बाँटना चाहिए, तभी ज्ञान निरंतर बढ़ता है और उसका लाभ मिलता है। इस कथा की सीख यही है कि हमें अपने ज्ञान को डिब्बे में बंद करके नहीं रखना चाहिए, इसे बढ़ाने का प्रयास करते रहना चाहिए। ज्ञान का निर्माण शिक्षार्थी के आत्म-नियमन और आत्म-जागरूकता के विकास से होता है। इस प्रकार, हम मात्र प्रासंगिक कौशल और जानकारी सीखने में शिक्षार्थियों का समर्थन नहीं कर सकते हैं, हमें ऐसे उपकरण और संदर्भ भी प्रदान करने चाहिए जिसमें वे अपने स्वयं के सीखने का प्रबंधन करने की अपनी क्षमता विकसित करें। जब किसी मनुष्य के मस्तिष्क में उसके इच्छा के अनुसार विचार उत्पन्न होने लगे, उसकी इच्छा के अनुसार विचार लुप्त होने लगे, उसकी इच्छा के अनुसार उसका मस्तिष्क कार्य करने लगे वह अमूर्त चिंतन में कार्य करना सीख जाए। उसे कल्पना, संकल्प, प्रण-प्रतिज्ञा आदि विचार अवस्थाओं का सम्यक बोध हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि उसे ज्ञान प्राप्त हो गया है। हम विभिन्न प्रकार की पठन, लेखन और आलोचनात्मक चिंतन गतिविधियों के माध्यम से ज्ञान का निर्माण कर सकते हैं, जो उन्हें पूर्व ज्ञान को सक्रिय करने, प्रश्न पूछने, समस्या समाधान करने, अपने विचारों पर चर्चा करने और दूसरों के साथ सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करता है। अनुभूति ज्ञान का एक स्रोत है क्योंकि यह हमें इस प्रकार के अवधारणात्मक तथ्य उपलब्ध कराता है। अनुभूति संभवत: ज्ञान का एक मूल स्रोत भी है क्योंकि यह अन्य स्रोतों पर स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। सच्चा ज्ञान आधारभूत ज्ञान होता है जो हमें आगे बढ़ने के लिए सहायता करता है। यह हमारे अभिज्ञान, अनुभव, शिक्षा और संशोधन के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। सच्चा ज्ञान हमें सत्य के प्रति आकर्षित करता है और हमें वास्तविकता का पता लगाने में सहायता करता है। यह ज्ञान होना कि जो अब तक सीखा-सिखाया गया है, अनुभव किया गया है, भोगा-चखा गया है, वह किसी भी प्रकार से अंतिम न है, न हो सकता है। उसमें परिवर्तन और सुधार होगा ही- आज या कल। बस सब कुछ देश, काल, परिस्थिति, हमारी समझ, शक्ति के अनुसार परिवर्तित होता ही रहेगा। 'व्यवहार सदैव ज्ञान पर आधारित होता है क्योंकि जीवन में कई ऐसी स्थितियाँ होती हैं जहाँ ज्ञान व्यवहार को संभाल सकता है।' यह संक्षिप्त कथन ज्ञान के एकाधिकार पर व्यवहार के महत्व को बढ़ाने का प्रयास करता है, जिसका अर्थ है कि यह सदैव सबसे अधिक महत्वपूर्ण नहीं होता है। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव व्यवहारिक ज्ञान को सर्वोच्च स्थान देते थे वह प्रकृति से उत्पन्न समस्त ज्ञान, वैभव, आनंद को समस्त प्राणियों में समान रूप से वितरित करने हेतु प्रयासरत रहे। इस कड़ी में भावातीत ध्यान-योग को प्रतिपादित कर उसका प्रचार-प्रसार निरंतर करते रहे। विश्व के अनेक राष्ट्रों के करोड़ों व्यक्तियों को इसका अभ्यास करवाकर रसास्वादन भी कराया और आज भी वह सभी साधक भावातीत ध्यान-योग का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट का अभ्यास कर अपने ज्ञान को व्यवहार में लाते हुए अपने आस-पास के वातावरण को आनंदित करने का प्रयास निरंतर कर रहे हैं, यही परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी को उनके जन्म दिवस ''ज्ञानयुग दिवस'' पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं। यह ज्ञानयुग दिवस समस्त विश्व में शांति एवं जीवन आनंद को सर्वसुलभ विस्तारित करने का स्वरूप है।
भोपाल [ महामीडिया] भावातीत ध्यान एक तकनीक है, विद्या है, योगक्रिया है। आत्मानुशासन की एक युक्ति है जिसका उद्देश्य है एकाग्रता, तनावहीनता, मानसिक स्थिरता व संतुलन, धैर्य और सहनशक्ति प्राप्त करना। ध्यान अपने अंतर में ही रमण करने का, अपनी अंतश्चेतना को विकसित करने का, बाहरी विकारों से मुक्त होकर मन की निर्मलता प्राप्त करने का एक उपक्रम है। ध्यान क्रिया से इन सब उद्देश्यों की प्राप्ति सचमुच सुगम होती है। इस दृष्टि से इस विद्या की उपादेयता स्वयंसिद्ध है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।
हमारे ऋषि मुनियों ने भारतीय वैदिक वांङ्गमय में अपने जीवन-पर्यन्त अनुभवों का निष्कर्ष प्रस्तुत किया है जिससे हम जीवन के महत्व व उद्देश्य समझकर अपने जीवन को आनन्दित कर सकते है। कलियुग में आनन्द की कल्पना कार्यसिद्धि तक ही सीमित है किंतु आनन्द तो असीमित है। हमारे मन की प्रवृत्ति के अनुसार ही हम आनन्द का अनुभव कर पाते हैं जैसे- मिष्ठान प्रिय मनुष्य मीठा खाकर आनन्दित हो उठता है। संगीत ज्ञाता मधुर संगीत सुनकर आनन्दित होता है। प्रकृति प्रेमी प्राकृतिक सौन्दर्य को देख कर आनन्दित होता है किंतु यह सब क्षणिक आनन्द है क्योंकि सभी का आनंद परिस्थितियों पर निर्भर है। सच्चा आनन्दित व्यक्ति वह है जिसके मन की प्रकृति ही आनन्दित रहती है।
यह स्मरण रखना चाहिए कि यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बहुत भूखा रहने वाले का, न बहुत सोने वाले का और न बहुत जागने वाले का सिद्ध होता है। वास्तव में आनंद और शांति देने वाला यह योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले, जीवन-कर्म में उचित प्रकार से रत रहने वाले तथा यथायोग्य (आवश्यकतानुसार) सोने-जागने वालों को ही सिद्ध (सफल) होता है। वर्तमान समय में जीवन के लक्ष्य के चयन में ही सम्पूर्ण जीवन समाप्त हो जाता है और अन्त में समझ आता है कि''न माया मिली न राम।'' हमारे ऋषि मुनियों ने भारतीय वैदिक वांङ्गमय में अपने जीवन-पर्यन्त अनुभवों का निष्कर्ष प्रस्तुत किया है जिससे हम जीवन के महत्व व उद्देश्य समझकर अपने जीवन को आनन्दित कर सकते है। कलियुग में आनन्द की कल्पना कार्यसिद्धि तक ही सीमित है किंतु आनन्द तो असीमित है। हमारे मन की प्रवृत्ति के अनुसार ही हम आनन्द का अनुभव कर पाते हैं जैसे- मिष्ठान प्रिय मनुष्य मीठा खाकर आनन्दित हो उठता है। संगीत ज्ञाता मधुर संगीत सुनकर आनन्दित होता है। प्रकृति प्रेमी प्राकृतिक सौन्दर्य को देख कर आनन्दित होता है किंतु यह सब क्षणिक आनन्द है क्योंकि सभी का आनंद परिस्थितियों पर निर्भर है। सच्चा आनन्दित व्यक्ति वह है जिसके मन की प्रकृति ही आनन्दित रहती है। अवसाद का स्थान न हो और ज्ञानी पुरुष कभी भी अवसाद ग्रस्त नहीं होते जैसे भगवान आदि शंकराचार्य जी की जब विद्वान मंडन मिश्र जी से परिचर्चा हुई तो मंडन मिश्र पराजित हुए क्योंकि भगवान आदि शंकराचार्य जी तो ज्ञान की प्रतिमूर्ति थे अत: उनका मन सदैव आनन्दित रहता था। समस्त सृष्टि का आधार विशुद्ध चेतना है जिसके स्पन्दन ही समस्त सृष्टि एवं आकाशीय पिण्डों के रूप में प्रकट हुए हैं। मानव चेतना की तीन विशेषताएँ हैं। वह ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक होती है। जब तक 'ब्रह्म' कि अनुभूति नहीं हो पाती, तब तक इंद्रियाँ अनुभव करती रहती हैं। मगर जब अनुभव करने वाला अपने अस्तित्व को भूल जाता है, तब चेतना की उस अवस्था में ब्रह्म की अनुभूति होती है। चेतना की इस "भावातीत अवस्था" की प्राप्ति शब्दों (मंत्रों) की सहजावस्था में मानसिक आवृत्ति से ही की जाती है। इसमें चेतना के कई स्तरों की चर्चा की जाती है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के बाद की चेतना की अवस्था भावातीत चेतना और इसके आगे पाँचवीं अवस्था तुरीयातीत चेतना की है। इस प्रकार साधना की इस सामान्य प्रक्रिया के द्वारा ब्रह्मांडी चेतना तक पहुँचा जा सकता है। भावातीत ध्यान करने वाले साधकों पर विदेशों में अनेक वैज्ञानिक प्रयोग भी किए जाते रहे हैं। परमपूज्य महेश योगी जी सदैव कहते थे कि जीवन आनन्द है, क्योंकि यदि हमारे मन की प्रवृत्ति आनन्दित हो जावे तब हम विषम परिस्थितियों में डरेंगे नहीं, घबरायेंगे नहीं और हमारा जीवन भी आनन्दित हो जाएगा। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने मन की प्रवृत्ति को आनन्दमय करने की युक्ति हम सभी को दी है "भावातीत-ध्यान-योग" के रूप में, अत: प्रतिदिन 15 से 20 मिनट प्रात: व संध्या नियमित भावातीत ध्यान योग का अभ्यास आपके मन को आनन्द से भर देगा और हमारे चारों ओर आनन्द की उपस्थिति, वैश्विक अशान्ति को मिटा कर पृथ्वी पर स्वर्ग के निर्माण की परिकल्पना को साकार कर देगी।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी ]
भोपाल [ महामीडिया] प्रतिदिन का सूर्य एक नवीन ऊर्जा के साथ अवतरित होता है, हमें भी अपना प्रत्येक दिन एक नए संकल्प नई चेतना के साथ जीना आना चाहिए । भगवान ने जीवन का प्रत्येक क्षण हमें नवसृजन, अभिनव चिंतन के लिए दिया है। प्रत्येक दिन हर रूप में नया है ।उसे न पहले जिया गया है और न ही वह पूर्व-अनुभूत है। किंतु दुर्भाग्य से अधिकतर लोगों का अधिकांश जीवन पर निंदा, षड्यंत्र, चापलूसी करने और दूसरों के लिए खाई खोदने में निकल जाता है। किसी को फँसाने की धुन में वे अपना दुर्लभ समय नष्ट करते रहते हैं किंतु वे मूढ़ हैं! भूल जाते हैं कि उनके सारे कृत्य ईश्वर दृष्टिगत हैं और दूसरों के लिए खोदी गई खाई में उन्हें स्वयं गिरना है। जो अभिशप्त हैं उनसे अमृत की अपेक्षा कैसी । चेतना वैज्ञानिक विश्व-विख्यात परम पूज्य महर्षि महेशयोगी जी ने जीवन के प्रत्येक दिन के प्रत्येक क्षण को उपयुक्त दिशा में उठने वाले कदम की शुभ घड़ी कहा है।आत्म-चेतना का यह कदम प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन एक नए उत्साह के साथ उठाना चाहिए। वह ऐसे कदमों को चेतना का स्तर ऊँचा उठाने वाला मानते हैं और सभी से यह अपेक्षा करते हैं कि मानव-कल्याण के लिए इस प्रकार के प्रयास किए जाने चाहिए।यह तभी संभव है जब हम अपने जीवन के प्रत्येक दिन को प्रभु का उपहार मानकर उसे अविस्मरणीय बनाने का न मात्र हित चिंतन करें साथ ही व्यावहारिक रूप में अपने आचरण में ढालने की चेष्टा करें ।हमारी बड़ी दुर्बलता यही है कि हम दूसरों को जितनी सरलता से देखते हैं उतनी सरलता से स्वयं को नहीं जान पाते जबकि स्वयं पर शासन करना सबसे बड़ा आत्मज्ञान है।मनुष्य एक मननशील प्राणी है इसमें गंभीचिंतन और विचार करने की क्षमता होती है, किंतु सच्चाई यही है कि मनुष्य का जीवन प्राय ऊहापोह और सत्य-असत्य की टकराहटों के बीच बीतता है ।क्या करना है और क्या नहीं करना यह निर्णय सरल नहीं होता ।इसी कारण उसके जीवन में अनेक दोहरे मानदंड बन जाते हैं। मगर उसके जीवन में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ भी आती हैं जो या तो उसेकमजोर करती हैं या उद्धृत बना देती हैं। इच्छापूर्ति को अपने अधिकार का विषय समझ बैठता है। भारत का वैदिक साहित्य प्राय वर्षों तक आत्मज्ञान और आत्मविस्तार की कथाओं का इतिहास है। स्वर्ग भी मनुष्य की उच्चतम कामनाओं का उदाहरण है। संसार के प्राय सभी धर्मों ने अपने-अपने ढंग से अपनी इच्छाओं की पूर्ति के मार्र्ग निकाले हैं इहलोक के साथ-साथ परलोक में भी हमारा पीछा नहीं छोड़ते। धरती पर साम्राज्यवाद का विस्तार भी इसी का उदाहरण है।प्राय दूसरों पर शासन करने की इच्छा खाद-पानी के समान हमारी साम्राज्यवादीधारणाओं को प्रबल करती है।महर्षि कहते थे कि दूसरों पर शासन करने के बदले स्वयं पर शासन करना सबसे बड़ा आत्मज्ञान है। यही आत्म-प्रज्ञा आत्मानुशासन है। हमारी सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि हम दूसरों को जितनी सरलता से देखते और परखते हैं उतनी सरलता से स्वयं को नहीं जान पाते। हम प्राय अपने बारे में बहुत कम सोचते हैं जबकि भारतीय चिंतन परंपरा में यह बात ठोक-बजाकर कही गई है कि निपुण व्यक्ति भी अपने कंधे पर नहीं चढ़ सकता। इसलिए ज्ञान की तीसरी आँख अधिकार के साथ कर्त्तव्य का भी ध्यान दिलाती है। कर्त्तव्य-बोध से रहित अधिकार एक शोषक की दुर्विनीत आकांक्षा भर बनकर रह जाता है।मन की नमनीयता ही उचित अधिकार का बोध करा सकती है और हमारी अन्तर्दृष्टि को तेज करने एक सरल उपाय है। महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान-योग का नियमित प्रात एवं संध्या 15 से 20 मिनट का अभ्यास आपको स्वयं को खोजने व समझने के आपके प्रयास में आपका सहखोजकर्त्ता व मार्गदर्शक भी सिद्ध होगा। शनै शनै आप स्वयं से ही आनंदित रहेंगे। आपका जीवन आनंदित रहेगा। "उपयोग व उपभोग’’के अंतर को समझने में आप सामर्थ्यवान बनेंगे। आपका जीवन आनन्द से भर जायेगा क्योंकि जीवन आनंद है।
जय गुरुदेव, जय महर्षि
ब्रह्मचारी गिरीश जी