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धर्म
इस आयोजन के अवसर पर ब्रह्मचारी जी ने कहा कि “भारतीय वैदिक परम्परा में 16 संस्कारों में व्रतबंध जिसे ‘उपनयन’ या ‘यज्ञोपवीत’ संस्कार भी कहा जाता है, का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। यह संस्कार व्यक्ति के द्वितीय जन्म का प्रतीक माना जाता है जहां से व्यक्ति "द्विज" कहलाने लगता है। इस शब्द का आध्यात्मिक एवं नैतिक महत्व है। व्रतबंध का प्रमुख उद्देश्य बालक को अनुशासन, पवित्रता और ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करना होता है। इसमें धारण किए जाने वाला यज्ञोपवीत तीन धागों से मिलकर बना होता है जो कि देव ऋण, पितृ ऋण और ऋषि ऋण का स्मरण करवाता है। यह जातक को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने और धर्म के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की प्रेरणा देता है।
“इसका वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण निर्विवाद है। यज्ञोपवीत को कान पर लपेटने से विशिष्ट नसों पर दबाव बनता है जो कि स्मरण शक्ति को बढ़ाने एवं एकाग्रता में सहायक माना जाता है। यह संस्कार चंचलता को त्याग कर गंभीरता और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने में एक महत्वपूर्ण योगदान देता है। इस विधानको छात्र जीवन से ब्रह्मचर्य आश्रम का प्रारम्भ माना जाता है। इससे संस्कार, सदाचार, सुचिता और संयम के बीच बीज प्रस्फुटित होते हैं जो कि हमारी प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पद्धति का एक आधार रही है। इससे बालक एक सुसंस्कृत नागरिक बनता है।‘यज्ञोपवीत’ संस्कार केवल एक प्रथा नहीं है बल्कि अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाली एक पवित्र यात्रा है जो बालकों को देवतुल्य गुणों की ओर ले जाती है”।
ब्रह्मचारी जी ने आशा व्यक्त की कि बड़ी संख्या में बालक इसमें सम्मिलत होकर पुण्य लाभ प्राप्त करेंगे।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी - संपादकीय]
भोपाल [महामीडिया] ईश्वर की सृष्टि में कुछ भी अमंगल नहीं होता, यहाँ जो होता है, मंगल ही होता है। यहाँ जन्म भी मंगल है तो मृत्यु भी मंगल है। बस हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होता है। जो जीवित हैं वो किसी और दृष्टिकोण से मृत्यु को देख रहे हैं और जो मृत हैं उनका दृष्टिकोण कुछ और है। जो जीवित हैं वो दु:खी हो जाते हैं, किंतु मरने वाला तो उत्सव में है, क्योंकि वो मरा ही नहीं। यर्थात में हम मरते नहीं हैं। हम शरीर नहीं आत्मा हैं और आत्मा को न जन्म छूता है न मृत्यु। आत्मा तो हर पल आनंद की अवस्था में रहती है। मरता तो ये शरीर है और हम शरीर नहीं। यदि हम शरीर होते तो मरने के बाद घर वाले अंतिम संस्कार न करते। फिर जो हम हैं वो मरने के बाद भी ज्यों के त्यों हैं। जीवन के इस रहस्य को जान कर अमर हो जाते हैं जिससे अंदर से मरने का भय निकल जाता है। ये मृत्यु का भय ही है, जो सभी को दु:खी करता रहता है। जैसे ही हम इस भय से पार पा जाते हैं, उसी क्षण आनंद में आ जाते हैं। अपने मन की चिंता, भय, आत्मग्लानि व संकोच जैसी सभी नकारात्मक भावनाओं तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मत्सर जैसी हानिकारक आदतों को पहचान कर उनमें से मुक्ति के उपाय। स्वयं के जीवन को सुशोभित करने वाले उत्सव, करुणा व सत्य जैसे अति सुंदर भावों को आप जब चाहें, अपने मन में जागृत कर सकते हैं। न जीवन में कोई अवकाश होता है। पूरे जीवन में कोई ऐसा क्षण नहीं आता जब वह ठहरता हो, विश्राम करता हो। इन दिनों हम कार्य के पीछे पागल, जिस अफरा-तफरी के साथ जीने के आदी हो गए हैं, उसने सारी दुनिया को 'मैडहाउस' बना दिया है। सब भागे जा रहे हैं। पता किसी को कि कहाँ जाना है? क्या पाना है? जितना मिलता है उतना ही कम लगता है। एक पड़ाव से दूसरा पड़ाव। लक्ष्य का कोई ठिकाना नहीं। सब चिल्ला रहे हैं शीघ्र चलो। किंतु कहाँ? क्या पाने की इच्छा है? नहीं जानते। क्या होगा इस सब का परिणाम? इतना समय भी नहीं कि इसके बारे में सोचें। सोचेंगे तो देरी हो जाएगी, बगल वाला आगे निकल जाएगा। इस भाग-दौड़ में सारे संबंध भी पीछे छूटते जा रहे हैं, यहाँ तक कि परमात्मा को भी हृदय से ही नहीं आँखों से भी ओझल कर दिया है। ऐसे ही लोगों ने जिनके लिए काम ही सब कुछ है, जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इससे जीवन की प्रसन्नता और शांति को वनवास हो गया है। जीवन से उत्सव के क्षण छिन गए हैं। उत्सव के स्थान पर मनोरंजन आता जा रहा है, जो कि क्षणिक तौर पर बनावटी प्रसन्नता देता है। उत्सव में हम स्वयं सम्मिलित होते हैं, मनोरंजन में मात्र दूसरे को देखते हैं। मनोरंजन पैसिव है, उत्सव स्वयं में ही बहुत एक्टिव है। उत्सव का मतलब है, हम नाच रहे हैं। प्रसन्नता हमारे अंदर से बाहर निकल रही है। मनोरंजन में कोई नाच रहा है, उसे नाचते थिरकते देख रहे हैं किंतु कहाँ स्वयं अपनों के साथ नाचने-थिरकने का आनंद और कहाँ किसी को नाचते हुए देखना। अपने जीवन को स्थिरता प्रदान करें। अपने विचारों को सुदृढ़ करें। स्वयं को तराशने का कार्य करें। इस हेतु परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान योग शैली का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या को 15 मीनट का अभ्यास आपके जीवन को आनंद से भर देगा।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ब्रह्मचारी गिरीश जी]
भोपाल [महामीडिया] हम प्रेरित होकर नवीन कार्य नहीं करते, कुछ नया करके ही प्रेरित होते हैं। प्रतिदिन अभ्यास करना, बिना यह सोचे कि आज का परिणाम क्या होगा ? सबसे सच्चा नियम है जिसे हम 'रचनात्मकता' कहते हैं। जब आप नित्य अभ्यास को अपना लक्ष्य बनाते हैं, तो परिणाम स्वयं बनकर निकलता है। प्राय: हम यह सोचते हैं कि प्रेरणा पहले आएगी और फिर कार्य होगा; पर मूलत: उलट है। हम कुछ नवीन कार्य करके ही प्रेरित होते हैं। प्रतिदिन कुछ नया करने का निर्णय लें। इस प्रक्रिया को महत्व दें और जानें कि आपका यह नियम ही एक नए कौशल को जन्म दे सकता है। साहस वह है, जो सच्चाई के समीप ले जाए। कमजोरी, डर नहीं है, यह वह साहस है जो हमें इंसान बनाता है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हम पूर्ण नहीं हैं, तब हम दूसरों के प्रति अधिक दयालु बनते हैं। जो व्यक्ति खुलकर कहता है- 'मुझे नहीं पता', या 'मैं गलत था', वही बहादुर है। सच्चा साहस वही है जो हमें सच्चाई के समीप लाता है। दुनिया को उन लोगों की आवश्यकता नहीं है, जो पूर्ण हैं परंतु उन लोगों की आवश्यकता अधिक है, जो सहज और सच्चे हैं। सुखी और स्वस्थ भविष्य के लिए क्या विकल्प चुनें? अगर आपको अभी एक ऐसा विकल्प चुनना हो जिससे आपका भविष्य स्वस्थ और सुखी बने तो आप प्रत्येक महीने क्या करेंगे? बचत बढ़ाएँगे? अपना कार्यस्थल बदलेंगे? यात्रा करेंगे? या स्वयं पर कार्य करेंगे। जीवन बहुत छोटा है; यहाँ मात्र स्वयं पर कार्य करने का समय है, वह भी कम है। लोगों को अपने अनुसार बनाने का प्रयास न करें। आपके बच्चे उस कार्य में सम्मिलित नहीं होना चाहते जो आपने तय किया था, 'कोई बात नहीं'। बहुत समय और ऊर्जा ऐसे लोगों से की गई उम्मीद करने में नष्ट होती है, जो आपके अनुसार नहीं चलना चाहते। कोई आपकी आवश्यकता के अनुसार नहीं दिख रहा, तो उसे परिवर्तित करने का प्रयास न करें। आप निश्चित करें कि आपको आगे क्या करना है? सफलता कभी पैसों से नहीं आँकी जा सकती। असली सफलता यह है कि स्वयं लोगों को प्रेरित करें एवं नया सोचें। अगर हम अपने कमरे की दीवार पर किसी स्थान या कार्य का चित्र लगाते हैं और यह सोचते हैं कि वह एक दिन वहाँ जायेंगे या वह कार्य करेंगे तो यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। जब कभी हम सब से पूछा जाता है कि इतना बड़ा संकट क्यों उठा रहे हो। हमारा उत्तर सरल होना चाहिए... सबसे बड़ा संकट तो कुछ नया न करना है। अगर आप गल्तियाँ करने से डरते हैं, तो कुछ बड़ा नहीं कर सकते। हमने असफलताएँ देखी हैं, किंतु हर असफलता एक सबक लेकर आती है। असफलता कष्ट देती है, किंतु वही कष्ट आपको सुदृढ़ बनाता है। अगर सब कुछ सरल होता, तो कोई परिवर्तन नहीं होता। संकट उठाएँ, प्रश्न पूछें और कभी मत मानें कि आप किसी बड़े कार्य के लिए छोटे हैं। प्रत्येक परिवर्तन का प्रारंभ ऐसे व्यक्ति से हुआ, जिसने कहा कि मैं प्रयास करूँगा। अगर आप यह कहने का साहस रखते हैं, तो भविष्य आपका है। परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव ही प्रत्येक दिन का शुभारंभ ''भावातीत ध्यान-योग'' के अभ्यास करने को प्रेरित करते थे क्योंकि प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 10 से 15 मिनट का ध्यान हमारे जीवन में आनंद, उत्साह एवं अतुलनीय साहस का संचार करता है, जो हमारे जीवन को आनंदमय बनाता है।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ब्रह्मचारी गिरीश जी]