शेयर बाजार 564 अंकों की बढ़त पर बंद
जयपुर [ महा मीडिया] शेयर बाजार में आज 21 सितंबर को बढ़त रही। सेंसेक्स 564 अंक की तेजी के साथ 74,859 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी में भी 68 अंक की बढ़त रही। रियल्टी और FMCG शेयर्स में ज्यादा खरीदारी रही।
जयपुर [ महा मीडिया] शेयर बाजार में आज 21 सितंबर को बढ़त रही। सेंसेक्स 564 अंक की तेजी के साथ 74,859 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी में भी 68 अंक की बढ़त रही। रियल्टी और FMCG शेयर्स में ज्यादा खरीदारी रही।
मैहर [ महा मीडिया] कल मंगलवार को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे जलझूलनी एकादशी और डोल ग्यारस कहते हैं। अभी गणेश उत्सव भी चल रहा है, इन दिनों में आने वाले इस एकादशी का महत्व काफी अधिक है, क्योंकि इस तिथि पर गणेश जी और भगवान विष्णु की पूजा एक साथ करने का विशेष योग बनता है। इस बार मंगलवार को यह तिथि होने से इस दिन मंगल देव की भी पूजा खासतौर पर करनी चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु सोते समय करवट बदलते हैं। इसी दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की भी पूजा होती है।
भोपाल [ महा मीडिया] 'महर्षि जी भीतर की शांति का मार्ग कैसे खोजें?' यह प्रश्न प्राय: शिष्य परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी से पूछा करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने एक और प्रश्न पूछना प्रारंभ किया- 'जिस शक्ति को मैं बाहर खोज रहा हूँ, क्या उसका कोई अंश मेरे भीतर भी है?' यहीं से मनुष्य की यात्रा बाहर से भीतर की ओर मुड़ती है। वेदों और उपनिषदों की चिंतन परंपरा इसी भीतर की यात्रा को महत्व देती है। वह कहती है, संसार की हर वस्तु परिवर्तित हो रही है। आज जो सुंदर है, कल उसका रूप परिवर्तित हो जाएगा। आज जो सुख दे रहा है, वह सदैव सुख नहीं देगा। धन, पद, प्रतिष्ठा, शरीर, संबंध और परिस्थितियाँ, सब परिवर्तनशील हैं। तो फिर स्थायी सुख कहाँ है? इसका उत्तर संसार छोड़ देने में नहीं है। जीवन से भागना कोई समाधान नहीं। मनुष्य को भोजन चाहिए, घर चाहिए, परिवार चाहिए, धन और सम्मान भी चाहिए। इन आवश्यकताओं को नकारा नहीं जा सकता। समस्या आवश्यकताओं में नहीं, हमारे ऊपर उनके हावी हो जाने में है। पैसा अर्जित करना गलत नहीं है, किंतु पैसे को जीवन का उद्देश्य बना लेना भीतर एक ऐसी भूख को जन्म दे देता है, जिसे कोई संपत्ति शांत नहीं कर सकती। पद पाना गलत नहीं, किंतु पद जाने पर स्वयं को समाप्त मान लेना खतरनाक है। प्रसिद्धी अच्छी लग सकती है, किंतु अपनी प्रसन्नता को दूसरों की प्रशंसा का आसक्त बना देना मनुष्य को भीतर से कमजोर कर देता है। यहीं वेदों की एक सरल सीख सामने आती है- संसार में रहो, किंतु संसार को अपने भीतर मत बसने दो। इसे ही अनासक्ति भाव कहा गया है। अनासक्ति का अर्थ जिम्मेदारियों से भागना नहीं है। इसका अर्थ है, जो कार्य हमारे सामने है, उसे पूरी निष्ठा से करना, किंतु उसके परिणाम को अपनी पूरी प्रसन्नता का आधार न बना लेना। याद रखिए, कर्म हमारे हाथ में है, हर परिणाम नहीं। आज के जीवन में यह बात संभवत: पहले से अधिक आवश्यक है। हम निरंतर तुलना कर रहे हैं, किसकी नौकरी अच्छी है, किसका घर बड़ा है, किसके पास अधिक पैसा है, कौन अधिक लोकप्रिय है? परिणाम? असंतोष बढ़ता जाता है। वेदों की दृष्टि कहती है कि बाहरी जीवन को व्यवस्थित करने के साथ भीतर के मन को समझना भी आवश्यक है। इसीलिए जीवन में ज्ञान और कर्म, दोनों चाहिए। मात्र भौतिक सुखों के पीछे भागते रहना हमें भीतर से खाली कर सकता है, किंतु संसार से पूरी तरह दूर हो जाना जीवन की जिम्मेदारियों से भागना है। सही मार्ग दोनों के बीच संतुलन का है। हमें यह जानने की आवश्यकता है कि दुनिया को परिवर्तित करने की हमारी क्षमता सीमित हो सकती है, किंतु अपने भीतर देखने की यात्रा सदैव हमारे हाथ में है। वेदों की यह सीख आज अधिक प्रासंगिक है। बाहर की दुनिया को जीतने से पहले अपने भीतर की दुनिया को पहचानिए। अगर सभी आनंद की खोज कर रहे हैं, तो लोग एक-दूसरे को इतना दु:ख क्यों दे रहे हैं? ऐसा नहीं है कि पराये ही दु:ख देते हैं, अपने भी देते हैं। अपने ही अधिक दु:ख देते हैं। कभी गणना की है, मित्र कितना दु:ख देते हैं? जिन्हें तुमसे घृणा है, वे तो दु:ख देंगे, स्वाभाविक है, किंतु जो कहते हैं कि तुमसे प्रेम है, उन्होंने कितना दु:ख दिया, इसकी गणना कर रखी है? अगर प्रत्येक व्यक्ति दु:ख दे रहा है, तो यह एक ही बात का प्रमाण है कि प्रत्येक व्यक्ति दु:ख से भरा है। हम वही तो देते हैं, जिससे हम भरे हैं। वही तो हमसे बहता है, जो हमारे भीतर भरा है। नीम के पत्ते अगर कड़वे होते हैं, तो इसी कारण कि कड़वापन उसके भीतर बह रहा है और आम अगर मीठा है, तो इसी कारण कि अमीरस उसके भीतर बह रहा है। हमारे व्यवहार से दूसरों को दु:ख मिलता है, क्योंकि भीतर हमारे कड़वाहट है। हम लाख कहें कि हम प्रेम करते हैं, किंतु प्रेम के नाम पर भी हम दूसरों के जीवन में नरक निर्मित करते हैं और सभी कहते हैं कि हम सुख को खोज रहे हैं। अगर आप सुख चाहते हो, तो कोई भी तो बाधा नहीं है, सुख तो लुट रहा है। सुख तो चारों ओर उपस्थित है। हम सभी ऐसे हैं जैसे सामने गंगा बहती हो और किनारे खड़े हो कहें- मैं प्यासा हूँ। झुको और पान करो। गंगा सदा सामने बहती है। आनंद हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हम जिस भी पल तय कर लेंगे कि आनंदित होना है, उसी क्षण आनंदित हो जायेंगे। यह हमारे रोएँ-रोएँ में समाया हुआ है। देरी का कोई कारण नहीं है। इसकी अनुभूति का सरल उपाय है। परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट का नियमित अभ्यास। 'जीवन आनंद है'।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी - संपादकीय]
भोपाल [ महा मीडिया] गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास में आती है। वैसे तो पूर्णिमा प्रत्येक महीने होती है, किंतु आषाढ़ की पूर्णिमा विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उस दिन भारत में गुरुपूर्णिमा मनाई जाती है। उस दिन चन्द्रमा बादलों से घिरा रहता है और यह काव्यात्मक घटना है। गुरु में ऐसी अथाह करुणा होती है कि वह अपने शिष्यों के पूरे अंधेरे को पी जाता है और बदले में उन्हें अपना शीतल उजाला देता है। व्यास पूजा, अर्थात गुरु पूर्णिमा शिष्यों और साधकों के जीवन में एक दिव्य तिथि होती है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि क्या हमने सच्चे शिष्य होने का धर्म निभाया? क्या हमने अपने श्रीगुरु के वचनों का पालन किया, उनके ज्ञान को अपने जीवन में उतारा? यह पर्व आत्म-परीक्षण का अवसर देता है। एक सच्चा साधक जानता है कि जीवन मात्र भौतिक सुखों को इकट्ठा करने के लिए नहीं है। यह जीवन धर्म को समझने, उसे जीने और फिर धर्मपूर्वक अर्जित धन से संसार का संचालन करने के लिए मिला है। विवेक और वैराग्य के जागरण के लिए मिला है। गृहस्थ जीवन जीते हुए भी साधक सजग रह सकता है। विवाह करें, परिवार बनाएँ, पर स्मरण रहे कि शरीर और उससे जुड़े सुख नश्वर हैं। इसलिए भोग में लिप्त होकर चेतना को गिरने न दें। विशेषकर गृहस्थ के लिए यह जागरूकता अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि वह रोज संसार, बाजार और भोगवाद से घिरा होता है। वहीं यदि साधना प्रबल हो, तो वही गृहस्थ उत्तम साधक बन जाता है। एक शिष्य वही है, जो साधना करता है। चाहे वह कितना भी व्यस्त हो, उसके अंदर एक आनंद, साधना की महक, सुख बना रहता है। जो प्रात:काल ध्यान करे और सायंकाल जप, वह अपने जीवन की दिशा को सार्थक करता है। जो कभी ध्यान, प्राणायाम और सिमरन न करे, ऐसा व्यक्ति गुरु-शिष्य परंपरा का अंग नहीं हो सकता। जब शिष्य ही न रहे, तो गुरु की उपस्थिति का क्या अर्थ? संपूर्ण सृष्टि के प्रथम गुरु महादेव हैं। ज्ञान की यह परंपरा महादेव से चली और ऋषि वेदव्यास तक पहुँची। वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में संहिताबद्ध किया, ब्रह्मसूत्र की रचना की, श्रीमद्भग्वद्गीता का भाष्य किया और वेदांत के प्रति श्रद्धा जगाई। संपूर्ण भारत में भ्रमण कर उन्होंने ऋषियों व आचार्यों को तैयार किया और उन्हें निर्देश दिया कि अपने-अपने क्षेत्रों में वह ज्ञान की धारा फैलाएँ। इसलिए गुरु पूर्णिमा, ऋषि वेदव्यास को समर्पित है। इस दिन हम उनको और समस्त ऋषियों-मुनियों, ऋषिकाओं, योगियों और योगिनियों को स्मरण करते हैं। हम उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं और याचना करते हैं कि हम भी उनके पदचिह्नों पर चल सकें। यह तभी संभव है जब शिष्य समर्पित भाव-दशा में हो। वह गुरु के प्रति झुका हुआ, अनुग्रह से लबालब हो, क्योंकि यह प्रेम का आदान-प्रदान है, बुद्धि का नहीं। गुरु से कोई कुतर्क नहीं किया जाता। शिष्यत्व ऐसी बात है, जो आप जीवन भर कर सकते हैं। शिष्य न मात्र आध्यात्मिक अर्थों में बनना है, वरन जीवन के प्रत्येक कदम पर हमें कुछ न कुछ सीखते रहना है। अनंत लोग भरे पड़े हैं, अनंत घटनाएँ घट रही हैं। आप सजग रहें और आपमें अहंकार की अकड़ न हो, तो बहुत कुछ सीख सकते हैं, सिखाने वाला छोटा बच्चा भी हो सकता है, कोई चींटी हो सकती है या कोई शिक्षक। हर घटना कुछ न कुछ सिखा सकती है, किंतु उसके लिए शिष्य होना आवश्यक है और वह बड़ी कठिन बात है। मनुष्य को सीखने के लिए जो विनम्रता, चित्त की सरलता चाहिए, जो सीखने को तैयार है, उसे अपनी अस्मिता और अहंकार को छोड़ देना पड़ता है, क्योंकि अहंकार सीखने न देगा। अहंकार आपको बदलने न देगा। अहंकार अपने से ऊपर किसी को रखने को कभी राजी ही नहीं है। सीखने को वह तैयार है, जिसने यह अनुभव कर लिया है कि अब तक अपने आप अनेक उपाय किए, पर कुछ भी सीख न पाया। सीखने को वही तैयार है, जिसने देख लिया अपने हृदय के गहन अंधकार को। जिसने देख लिया कि मैं अपने जीवन को मात्र उलझा रहा हूँ, सुलझा नहीं रहा, बल्कि जितना सुलझाने की प्रयास करता हूँ, बात और उलझती चली जाती है। ऐसे पीड़ा के क्षणों में, ऐसी संताप की अवस्था में अपनी परिस्थिति को पूरा-पूरा देखकर शिष्यत्व का जन्म होता है। गुरु तो सदैव उपस्थित है, सीखने वाले नहीं होते। 'भारत में बड़ी पुरानी लोकोक्ति है कि जब सतयुग था, तब गुरु की इतनी आवश्यकता न थी, किंतु कलियुग में गुरु की बड़ी आवश्यकता होगी। आखिर इसका क्या कारण है!... हम किस अनुसार से बाँटते हैं संसार को? सतयुग कहते हैं उस समय को, जब लोग बड़े सचेत थे, सावधान थे। और कलियुग कहते हैं उस युग को, जब लोग बड़े सोए हुए हैं, मूर्छित हैं।' अत: स्वयं को चेतनावान बनने के लिए परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने भावातीत ध्यान योग को प्रतिपादित किया। भावातीत ध्यान योग का नियमित रूप से प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट का अभ्यास आपकी मूर्छा का हरण कर आपको चेतनावान बनाने का प्रयास रहित माध्यम है।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी - संपादकीय ]
भोपाल [ महामीडिया] एक सुंदर जापानी कहानी है। एक आदमी चट्टानों को तराशने का कार्य करता था। वह कड़ा परिश्रम करता, किंतु कमाई कुछ विशेष नहीं होती। वह असंतुष्ट रहता था। वह आहें भरा करता। एक बार वह चिल्लाकर बोला, 'काश! मैं इतना धनवान होता कि रेशमी गद्दों पर आराम करता।' स्वर्ग से एक देवदूत आया और बोला, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' वह आदमी धनवान हो गया, उसने रेशम के गद्दे पर स्वयं को बैठा हुआ पाया। तभी वहाँ से उस देश का राजा निकला। उसके रथ के आगे और पीछे घुड़सवार चल रहे थे और सिर के ऊपर सोने का छत्र लगा हुआ था। जब उस धनवान ने यह दृश्य देखा, तो वह अपनी स्थिति से असंतुष्ट हो गया। आहें भरते हुए चिल्लाया, 'मैं राजा बनना चाहता हूँ।' देवदूत फिर आया और बोला, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' अचानक उस धनवान ने स्वयं को रथ पर पाया। उसके आगे घुड़सवार चल रहे थे, पीछे घुड़सवार चल रहे थे और ऊपर छत्र लगा हुआ था। उस दिन सूरज तमतमाता हुआ धरती को ऐसे झुलसा रहा था कि जैसे सब कुछ स्वाहा हो जाएगा। राजा को शिकायत हुई कि सूरज की शक्ति उससे अधिक है। वह असंतुष्ट हो गया। वह चिल्लाया, 'मैं सूरज होना चाहता हूँ।' देवदूत आया और कहा, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' राजा सूरज बन गया। उसने धरती की सारी खर-पतवार जला दी और पृथ्वी के समस्त राजाओं के काफिलों को झुलसा दिया। फिर एक बादल आया और उसके व पृथ्वी के बीच अड़ गया। इस प्रकार वह बादल बन गया। बादल ने धरती पर मोटी-मोटी बूँदें बरसाईं, जिनसे नदियों में बाढ़ आ गई, घर बह गए, खेत नष्ट हो गए। उसकी बूँदें एक चट्टान पर गिरीं, जो टस से मस न हुई। बादल क्रोधित हो गया, क्योंकि चट्टान उसकी शक्ति के सामने झुक नहीं रही थी। वह चिल्लाया, 'मैं चट्टान होना चाहता हूँ।' देवदूत ने चट्टान बना दिया। तभी एक आदमी छैनी व हथौड़ी लिए हुए आया और चट्टान को तराशने लगा। चट्टान ने सोचा कि इस आदमी के पास इतनी शक्ति कैसे है, जो मेरी छाती से पत्थर तराश रहा और वह असंतुष्ट हो गया। वह चिल्लाया, 'मैं कमजोर हूँ। मैं आदमी बनना चाहता हूँ।' देवदूत ने फिर से उसे संगतराश बना दिया। अब भी वह कड़ा परिश्रम करता और थोड़ी सी कमाई होती, मगर उसी में संतुष्ट था। संतोष का अर्थ उस सबके प्रति बोध से भरना है, जो तुम्हारे पास है। यदि तुम्हें एक झलक भी मिल जाए कि कितना कुछ तुम्हें मिला हुआ है, तो क्या तुम्हारी अपेक्षा रह जाएगी? अधिक की अपेक्षा करना मात्र अनुग्रह की कमी है। यदि तुम पूरे परिप्रेक्ष्य को देख पाओ, तो जो तुम्हें मिला है, उसके प्रति अहोभाव से भर जाओगे। जब हम चर्चा करते हैं कि परिवर्तन कैसे लाया जाए, तो उस परिवर्तन से हमारा तात्पर्य सामान्यत: सतही परिवर्तन से होता है। दृढ़ निश्चय, निष्कर्ष, विश्वास, नियंत्रण और झिझक के द्वारा हम उस सतही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संघर्ष करते हैं, जिसे चाहते हैं; जिसके लिए हम लालायित हैं। हम यह उम्मीद लगाते हैं कि उस तक पहुँचने में अचेतन मन, हमारे मन के गहरे स्तर तक हमारी सहायता करेंगे। हमें लगता है कि यह आवश्यक है कि हम उन गहरे स्तरों को अनावृत्त करें, परंतु सतही स्तरों और तथाकथित गहरे स्तरों के बीच एक शाश्वत द्वंद्व है। मनोवैज्ञानिक इससे भली-भाँति परिचित हैं। क्या यह परिवर्तन लाएगा? क्या यह हमारे दैनिक जीवन का सर्वाधिक मूलभूत और महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है कि कैसे अपने आप में एक आमूल परिवर्तन लाया जाए? क्या सतही स्तर पर कुछ बदलाव वह परिवर्तन ला सकेंगे? क्या चेतना के 'मैं' के विभिन्न स्तरों को समझना; अतीत अर्थात् बचपन से आज तक के विभिन्न व्यक्तिगत अनुभवों को अनावृत्त करना; अपने माता-पिता, पूर्वजों व प्रजाति के सामूहिक अनुभवों का स्वयं में निरीक्षण करना; उस समाज विशेष की संस्कारबद्धता का अनुसंधान करना, जिसमें हम रहते हैं, क्या यह सब विश्लेषण ऐसा परिवर्तन ला पाएगा, जो छिटपुट सामंजस्य बिठाना भर न हो? मैं यह महसूस करता हूँ और निस्संदेह आपको भी यह महसूस होता होगा कि व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आवश्यक है। एक ऐसा परिवर्तन, जो प्रतिक्रिया मात्र नहीं है, जो परिवेश की माँगों के दबाव और तनाव का परिणाम नहीं है। ऐसा परिवर्तन कैसे लाया जाए? चेतना मानव जाति के अनुभव का योग तो है ही, उसमें वर्तमान से अपना विशिष्ट संपर्क भी जुड़ा है; क्या वह चेतना परिवर्तन ला सकती है? क्या अपनी चेतना व गतिविधियों का मेरा अध्ययन मन को यूँ स्थिर कर सकता है, जिससे वह बिना निंदा के निरीक्षण कर सके? परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान का प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट नियमित अभ्यास से स्वयं में स्थित होकर जब हम स्वयं का अवलोकन करते हैं तो हम पाते हैं कि प्रत्येक परिवर्तन जब प्रकृति के नियमों के अनुकूल होता है तो वह हमें भीतर एवं बाहर से जोड़ता है एक अनुकूलनशीलता का अनुभव होता है जो हमें परिवर्तनों के प्रति सकारात्मक दृष्टि देता है तो हमें उत्तरोत्तर प्रसन्नता का अनुभव होता है क्योंकि जीवन संघर्ष नहीं आनंद है।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी - संपादकीय]