वैज्ञानिक रिपोर्ट में वन्यजीव संरक्षण का बालाघाट मॉडल उभरा

वैज्ञानिक रिपोर्ट में वन्यजीव संरक्षण का बालाघाट मॉडल उभरा

भोपाल [ महामीडिया] डब्ल्यूडब्ल्यूएफइंडिया ने मध्य प्रदेश वन विभाग के सहयोग से उत्तरी और दक्षिणी बालाघाट वन प्रभागों में बड़े मांसाहारी और जंगली खुर वाले जानवरों की स्थिति पर एक वैज्ञानिक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट संरक्षित क्षेत्रों के बाहर वन्यजीव संरक्षण के एक अनूठे मॉडल के रूप में बालाघाट के उभरने का जश्न मनाती है। रिपोर्ट का विमोचन आज मध्य प्रदेश वन विभाग के पीसीसीएफ सुभरंजन सेन, मध्य प्रदेश की मुख्य वन्यजीव वार्डन डॉ. समिता राजोरा, मध्य प्रदेश वन विभाग के एपीसीसी वन्यजीव एल. कृष्णमूर्ति; बालाघाट के मुख्य वन संरक्षक गौरव चौधरी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के महासचिव रवि सिंह, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के मध्य भारत निदेशक संकेत भाले और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया की मध्य भारत संरक्षण विज्ञान विशेषज्ञ डॉ.दीप्ति गुप्ता ने किया। इस रिपोर्ट में उभरकर सामने आया है की मध्य भारत के भूभाग का हिस्सा, मध्य प्रदेश में स्थित उत्तरी और दक्षिणी बालाघाट वन प्रभाग, कान्हा और पेंच बाघ अभ्यारण्यों के बीच एक महत्वपूर्ण गलियारा बनाते हैं जो बाघों के फैलाव को सक्षम बनाता है और कान्हा-पेंच गलियारे में दीर्घकालिक आनुवंशिक संपर्क सुनिश्चित करता है।

नवंबर 2021 से फरवरी 2022 के बीच किए गए अध्ययन में बालाघाट में 24 स्तनधारी प्रजातियों की पहचान की गई जो बालाघाट की समृद्ध जैव विविधता को उजागर करती है। दक्षिण बालाघाट के केवल दो क्षेत्रों में 18 बाघ और 27 तेंदुए देखे गए। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि बालाघाट बड़े मांसाहारी जीवों, विशेष रूप से बाघों और तेंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण आश्रय स्थल है। खुर वाले जानवरों की संख्या अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद, मध्य भारत के कुछ संरक्षित क्षेत्रों, जैसे संजय-दुबरी बाघ अभ्यारण्य, वीरंगना दुर्गावती बाघ अभ्यारण्य और गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान के बराबर थी।

बालाघाट के वर्तमान प्रादेशिक वन क्षेत्र होने के कारण, इन जीवों और उनके आवासों के प्रबंधन और निगरानी के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन सीमित हैं। इस अध्ययन के परिणाम न केवल बालाघाट की समृद्ध स्तनधारी जैव विविधता को उजागर करते हैं बल्कि यह भी मांग करते हैं कि बालाघाट को भी किसी भी संरक्षित क्षेत्र के समान संरक्षण संसाधन और ध्यान दिया जाए ।
रिपोर्ट में बालाघाट को एक लचीले, बहुउपयोगी भू-भाग के रूप में सुरक्षित करने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप भी प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट में बुनियादी ढांचे के विकास से पर्यावास विखंडन, खनन कार्यों का विस्तार, पर्यावास क्षरण और संभावित मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी प्रमुख संरक्षण चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है, जिनका समाधान आवश्यक है। बेहतर संरक्षण और वन्यजीव निगरानी के अलावा, रिपोर्ट में व्यवस्थित पर्यावास प्रबंधन की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है, जिसमें आक्रामक प्रजातियों को हटाना, वन अग्नि प्रबंधन और आर्द्रभूमि संरक्षण शामिल हैं। रिपोर्ट में सामुदायिक संस्थानों को मजबूत करने और वन प्रशासन में समुदाय की भूमिका बढ़ाने की भी सिफारिश की गई है।

इस अवसर पर बोलते हुए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के महासचिव रवि सिंह ने कहा "बालाघाट संरक्षित क्षेत्रों से परे बाघ संरक्षण के लिए आशा की किरण है। यह दर्शाता है कि कैसे प्रबंधन दिशा-निर्देश, सहयोगात्मक और विज्ञान-आधारित संरक्षण गैर-संरक्षित वनों को वन्यजीवों के लिए समृद्ध आवासों में बदल सकता है।"

इस अवसर पर वन विभाग के पीसीसीएफ सुभरंजन सेन ने कहा "यह रिपोर्ट केवल संख्या और वितरण पैटर्न का दस्तावेजीकरण नहीं है बल्कि यह दर्शाती है कि सतत संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी क्षेत्रीय वन परिदृश्यों में क्या हासिल कर सकती है। बालाघाट से प्राप्त सबक मध्य प्रदेश और भारत में संरक्षण के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को पुष्ट करते हैं कि वन्यजीवों की सुरक्षा केवल संरक्षित क्षेत्रों के भीतर ही नहीं बल्कि संपूर्ण वन परिदृश्यों में होगी।"


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