साधना का सुवर्णकाल चतुर्मास
भोपाल [ महामीडिया] आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भगवान विष्णु योगनिद्रा द्वारा विश्रांतियोग का आश्रय लेते हुए आत्मा में समाधिस्थ रहते हैं । इस काल को ‘चतुर्मास’ कहते हैं । इस काल में किया हुआ व्रत-नियम, साधन-भजन आदि अक्षय फल प्रदान करता है । चतुर्मास साधना का सुवर्णकाल माना गया है । जिस प्रकार चींटियाँ वर्षाकाल हेतु इससे पहले के दिनों में ही अपने लिए उपयोगी साधन-संचय कर लेती हैं, उसी प्रकार साधक को भी इस अमृतोपम समय में पुण्यों की अभिवृद्धि कर परमात्म-सुख की ओर आगे बढ़ना चाहिए ।चतुर्मास में शास्त्रोक्त नियम-व्रत पालन, दान, जप-ध्यान, मंत्रानुष्ठान, गौ-सेवा, हवन, स्वाध्याय, सत्पुरुषों की सेवा, संत-दर्शन व सत्संग-श्रवण आदि धर्म के पालन से महापुण्य की प्राप्ति होती है । जो मनुष्य नियम, व्रत अथवा जप के बिना चौमासा बिताता है, वह मूर्ख है । चतुर्मास का पुण्यलाभ लेने के लिए प्रेरित करते हुए कहा गया है ‘‘तुम यह संकल्प करो कि यह जो चतुर्मास शुरू हो रहा है उसमें हम साधना की पूँजी बढ़ायेंगे । यहाँ के रुपये तुम्हारी पूँजी नहीं हैं तुम्हारे शरीर की पूँजी हैं । लेकिन साधना तुम्हारी पूँजी होगी मौत के बाप की ताकत नहीं जो उसे छीन सके !चतुर्मास में कोई अनुष्ठान का नियम अथवा एक समय भोजन और एकांतवास का नियम ले लो । कुछ समय ‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ या ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तक पढ़ने अथवा सत्संग सुनने का नियम ले लो । इस प्रकार अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ-न-कुछ साधन-भजन का नियम ले लेना । चतुर्मास सब गुणों से युक्त समय है । अतः इसमें श्रद्धा से शुभ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए । साधकों के लिए आश्रम के पवित्र वातावरण में मौन-मंदिरों की व्यवस्था भी है ।