संपादकीय : स्वयं की दिव्यता

भोपाल [महामीडिया] ईश्वर की सृष्टि में कुछ भी अमंगल नहीं होता, यहाँ जो होता है, मंगल ही होता है। यहाँ जन्म भी मंगल है तो मृत्यु भी मंगल है। बस हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होता है। जो जीवित हैं वो किसी और दृष्टिकोण से मृत्यु को देख रहे हैं और जो मृत हैं उनका दृष्टिकोण कुछ और है। जो जीवित हैं वो दु:खी हो जाते हैं, किंतु मरने वाला तो उत्सव में है, क्योंकि वो मरा ही नहीं। यर्थात में हम मरते नहीं हैं। हम शरीर नहीं आत्मा हैं और आत्मा को न जन्म छूता है न मृत्यु। आत्मा तो हर पल आनंद की अवस्था में रहती है। मरता तो ये शरीर है और हम शरीर नहीं। यदि हम शरीर होते तो मरने के बाद घर वाले अंतिम संस्कार न करते। फिर जो हम हैं वो मरने के बाद भी ज्यों के त्यों हैं। जीवन के इस रहस्य को जान कर अमर हो जाते हैं जिससे अंदर से मरने का भय निकल जाता है। ये मृत्यु का भय ही है, जो सभी को दु:खी करता रहता है। जैसे ही हम इस भय से पार पा जाते हैं, उसी क्षण आनंद में आ जाते हैं। अपने मन की चिंता, भय, आत्मग्लानि व संकोच जैसी सभी नकारात्मक भावनाओं तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मत्सर जैसी हानिकारक आदतों को पहचान कर उनमें से मुक्ति के उपाय। स्वयं के जीवन को सुशोभित करने वाले उत्सव, करुणा व सत्य जैसे अति सुंदर भावों को आप जब चाहें, अपने मन में जागृत कर सकते हैं। न जीवन में कोई अवकाश होता है। पूरे जीवन में कोई ऐसा क्षण नहीं आता जब वह ठहरता हो, विश्राम करता हो। इन दिनों हम कार्य के पीछे पागल, जिस अफरा-तफरी के साथ जीने के आदी हो गए हैं, उसने सारी दुनिया को 'मैडहाउस' बना दिया है। सब भागे जा रहे हैं। पता किसी को कि कहाँ जाना है? क्या पाना है? जितना मिलता है उतना ही कम लगता है। एक पड़ाव से दूसरा पड़ाव। लक्ष्य का कोई ठिकाना नहीं। सब चिल्ला रहे हैं शीघ्र चलो। किंतु कहाँ? क्या पाने की इच्छा है? नहीं जानते। क्या होगा इस सब का परिणाम? इतना समय भी नहीं कि इसके बारे में सोचें। सोचेंगे तो देरी हो जाएगी, बगल वाला आगे निकल जाएगा। इस भाग-दौड़ में सारे संबंध भी पीछे छूटते जा रहे हैं, यहाँ तक कि परमात्मा को भी हृदय से ही नहीं आँखों से भी ओझल कर दिया है। ऐसे ही लोगों ने जिनके लिए काम ही सब कुछ है, जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इससे जीवन की प्रसन्नता और शांति को वनवास हो गया है। जीवन से उत्सव के क्षण छिन गए हैं। उत्सव के स्थान पर मनोरंजन आता जा रहा है, जो कि क्षणिक तौर पर बनावटी प्रसन्नता देता है। उत्सव में हम स्वयं सम्मिलित होते हैं, मनोरंजन में मात्र दूसरे को देखते हैं। मनोरंजन पैसिव है, उत्सव स्वयं में ही बहुत एक्टिव है। उत्सव का मतलब है, हम नाच रहे हैं। प्रसन्नता हमारे अंदर से बाहर निकल रही है। मनोरंजन में कोई नाच रहा है, उसे नाचते थिरकते देख रहे हैं किंतु कहाँ स्वयं अपनों के साथ नाचने-थिरकने का आनंद और कहाँ किसी को नाचते हुए देखना। अपने जीवन को स्थिरता प्रदान करें। अपने विचारों को सुदृढ़ करें। स्वयं को तराशने का कार्य करें। इस हेतु परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान योग शैली का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या को 15 मीनट का अभ्यास आपके जीवन को आनंद से भर देगा।

।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।

[ब्रह्मचारी गिरीश जी]

 

- ब्रह्मचारी गिरीश जी

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