न्यायिक मर्यादा पर एक बेबाक राय
मैहर [ महा मीडिया] मौजूदा जजों के बच्चों की सरकारी वकील के तौर पर नियुक्ति को लेकर हालिया विवादों ने न्यायिक मर्यादा और हितों के टकराव के मुद्दे को चर्चा में ला दिया। जस्टिस ओक ने राय दी कि आदर्श रूप से मौजूदा जजों के बच्चों को अपने माता-पिता के रिटायर होने तक सरकारी संस्थानों और एजेंसियों के लिए पैनल वकील के तौर पर नियुक्ति से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी संयम बरतने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता में जनता का भरोसा बनाए रखने में मदद मिलेगी। इंटरव्यू में जस्टिस ओक ने कहा कि हालांकि मौजूदा जजों के बच्चों के वकील के तौर पर प्रैक्टिस करने में सिद्धांत रूप से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन चिंता तब पैदा होती है, जब उन्हें प्रवर्तन निदेशालय भारत के चुनाव आयोग , राष्ट्रीय जांच एजेंसी और अन्य सरकारी निकायों जैसे संस्थानों के लिए पैनल वकील के तौर पर नियुक्त किया जाता है। उन्होंने ज़ोर दिया कि ऐसी नियुक्तियां (पैनल में शामिल करना) एक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के ज़रिए होनी चाहिए, जिसमें योग्यताएँ साफ़ तौर पर तय हों और सभी योग्य वकीलों को मुकाबला करने का मौका मिले। जस्टिस ओक ने कहा कि पैनल में वकीलों को शामिल करने से पहले संस्थाओं को योग्यता के नियम तय करने चाहिए, आवेदन मँगाने चाहिए और एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनानी चाहिए।