नवरात्रि की नवमी को 'नवाखाई' की परम्परा

नवरात्रि की नवमी को 'नवाखाई' की परम्परा

कटनी [ महा मीडिया] 

नवरात्रि की नवमी को 'नवाखाई' मनाने की परम्परा मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में देखने को मिलती है। सामान्यतः 'नुआखाई' का मुख्य पर्व अपनी कुलदेवी की परम्परा के अनुसार इसे शारदीय नवरात्रि की नवमी या दशहरा (विजयादशमी) के दिन मनाने का विशेष विधान है। यह पर्व मूल रूप से कृषि, प्रकृति और मातृशक्ति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का त्योहार है।नवाखाई मुख्य रूप से नई फसल (धान) के स्वागत का एक कृषि पर्व है जिसकी तिथियां अलग-अलग क्षेत्रों और संस्कृतियों के अनुसार बदलती हैं। नवरात्रि की नवमी या दशहरा के दौरान इसे मनाने की एक विशेष और समृद्ध पारंपरिक पृष्ठभूमि है । 'नवाखाई' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: 'नवा' (नया) और 'खाई' (खाना)। इसका सीधा अर्थ है नई फसल के अन्न का पहली बार भक्षण करना। खेतों में जब धान की नई फसल तैयार होती है तो किसान उसे सीधा खाने के बजाय सबसे पहले अपनी कुलदेवी, इष्टदेव और पूर्वजों को अर्पित करते हैं। यह माना जाता है कि नई फसल पर पहला अधिकार प्रकृति और उस क्षेत्र की रक्षक देवी का है। इसलिए नवमी की पूजा के दिन नए चावल का  खीर बनाकर देवी को चढ़ाया जाता है। खेतों से नई धान की बालियाँ (नेवई) तोड़कर लाई जाती हैं। नवमी के दिन पूजा स्थल पर इष्ट देवों और पूर्वजों को धूप-लोबान देकर यह नई फसल अर्पित की जाती है।देवी को भोग लगाने के बाद परिवार का सबसे बुजुर्ग सदस्य सभी सदस्यों को प्रसाद स्वरूप नया अन्न (चावल) वितरित करता है। इस दिन पूरा परिवार एक ही छत के नीचे बैठकर पारंपरिक व्यंजन ग्रहण करता है। अन्न ग्रहण करने के बाद घर के छोटे सदस्य अपने से बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं जिसे 'नवाखाई जुहार' कहा जाता है। 

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