दीपावली पर्व पर सूरन खाने की परंपरा
भोपाल [ महा मीडिया] दिवाली के दिन सूरन (जिमीकंद या ओल) की सब्जी खाने की परंपरा उत्तर भारत विशेष रूप से मध्य प्रदेशऔर महाराष्ट्र के कई हिस्सों में काफी पुरानी और शुभ मानी जाती है। सूरन की यह विशेषता है कि इसे जमीन से खोदकर निकालने के बाद भी यदि इसका थोड़ा सा हिस्सा या जड़ मिट्टी में रह जाए तो उससे दोबारा पौधा उग जाता है। इसे परिवार में धन, संपदा और वंश की निरंतर वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि दिवाली पर सूरन खाने की परंपरा सबसे पहले काशी से शुरू हुई जो बाद में उत्तर भारत के कई अन्य क्षेत्रों में फैल गई। लोकमान्यताओं के अनुसार, दिवाली के दिन सूरन खाना अत्यंत शुभ होता है और इसे मां लक्ष्मी की कृपा से जोड़कर देखा जाता है।सूरन फाइबर, प्रोटीन, विटामिन (जैसे विटामिन बी6, सी) और विभिन्न मिनरल्स से भरपूर होता है।यह एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है, जो पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। सूरन को काटते समय या पकाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह गले में खराश या खुजली (कराहट) पैदा कर सकता है। इसलिए इसे बनाते समय नींबू का रस, इमली या खटाई का उपयोग जरूर किया जाता है ताकि इसका यह असर खत्म हो सके।