बौद्धिक संपदा अधिकार पर दिल्ली हाईकोर्ट का सराहनीय निर्णय
भोपाल [ महा मीडिया] दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई वेबसाइट ऐसे सामान या सेवाएं उपलब्ध कराती है जो कथित तौर पर किसी के अधिकारों का उल्लंघन (इन्फ्रिंजमेंट) करते हैं तो केवल उस वेबसाइट तक पहुंच होने भर से ही किसी अदालत को बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) उल्लंघन के मामले की सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र नहीं मिल जाता। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने बौद्धिक संपदा विवादों से जुड़े 17 कमर्शियल मुकदमों के एक समूह पर निर्णय सुनाते हुए यह टिप्पणी की। इनमें से कई मामले अदालत में तब दायर किए गए जबकि न तो वादी (केस करने वाला) और न ही प्रतिवादी (जिसके खिलाफ केस किया गया) राष्ट्रीय राजधानी (दिल्ली) में स्थित थे। अदालत ने जोर देकर कहा कि कोई वादी किसी बनावटी लेन-देन या अदालत के साथ कृत्रिम संबंध दिखाकर खुद से क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं बना सकता। बौद्धिक संपदा अधिकार कानूनी अधिकार हैं जो किसी व्यक्ति या कंपनी को उसकी बुद्धि, रचनात्मकता या नवाचार से उत्पन्न कार्यों के लिए दिए जाते हैं। अधिकार रचनाकार को एक निश्चित समय के लिए अपनी रचना के उपयोग का विशेष अधिकार देते हैं ताकि कोई दूसरा व्यक्ति बिना अनुमति उसकी नकल न कर सके।