मोटापे के विरुद्ध वैश्विक मुहिम कमजोर पड़ी
भोपाल [ महा मीडिया] दुनिया की सबसे बड़ी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (पैकेज्ड चिप्स, नम्कीन, क्रिस्प्स) कंपनियां सेहतमंद खान-पान को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों को अदालतों में घसीटकर मोटापे के विरुद्ध वैश्विक मुहिम को कमजोर कर रही हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम गेब्रेयेसस का तो कम से कम यही मानना है। उनका कहना है कि इन कंपनियों की मुकदमेबाजी की वजह से देशों को स्वास्थ्य और कानूनी खर्च के मद में हजारों करोड़ रुपए गंवाने पड़ रहे हैं। दिलचस्प यह है कि ज्यादातर मुकदमे कंपनियां हार जाती हैं। फिर भी मुकदमा ठोकना नहीं छोड़तीं। एक नई कई देश जांच के मुताबिक जितने भी मुकदमों का फैसला आ चुका है उनमें से तीन-चौथाई में सरकारों की ही जीत हुई। हारी हुई कंपनियां भी असल में बड़ा दांव जीत जाती हैं क्योंकि मुकदमा लड़ते-लड़ते ही नीति वर्षों तक अटकी रहती है। जांच में सामने आया कि दुनियाभर में इस तरह की मुकदमेबाजी में अब तक 600 साल लग हो चुके हैं यानी हर मुकदमे में औसतन ढाई साल लग रहे हैं। जांच के मुताबिक पैकेट के आगे लगने वाले वॉर्निंग लेबल पर सबसे ज्यादा, फिर जंक फूड पर टैक्स और इसके बाद विज्ञापन-मार्केटिंग पर लगी पाबंदियों को लेकर कंपनियों ने सबसे ज्यादा सरकारों को अदालत तक घसीटा। इस वैश्विक मुहिम का उद्देश्य मोटापे के प्रति जागरूकता बढ़ाना इसके सामाजिक कलंक को दूर करना और स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देना है।