लोक आस्था का पर्व कजलियां

लोक आस्था का पर्व कजलियां

भोपाल [ महा मीडिया] महाकोशल क्षेत्र में प्रकृति, प्रेम और वीरता के प्रतीक कजलियां (कजली) पर्व की तैयारियां नागपंचमी से ही शुरू हो जाती हैं जिसमें नए अन्न के पौधे उगाए जाते हैं और रक्षाबंधन के अगले दिन इसे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व नागपंचमी के दिन टोकरी या बर्तनों में मिट्टी भरकर बीज (गेहूं या जवारे) बोने के साथ शुरू होता है ।रक्षाबंधन के अगले दिन कजलियों को सरोवरों या तालाबों में प्रवाहित (सिराने) किया जाता है और एक-दूसरे के कान पर रखकर शुभकामनाएं दी जाती हैं। महाकोशल अंचल में यह वीर योद्धा आल्हा-ऊदल की ऐतिहासिक विजय और शौर्य गाथाओं से भी जुड़ा हुआ है। आधुनिक जीवनशैली के दौर में भी कजलियां पर्व कई क्षेत्रों में अपनी पारंपरिक पहचान बनाए हुए है। यह त्योहार नई पीढ़ी को अपनी मिट्टी, कृषि परंपराओं और लोक संस्कृति से जोड़ने का अवसर देता है। हरी कजलियां प्रकृति के प्रति सम्मान और खुशहाल जीवन की सामूहिक कामना का प्रतीक मानी जाती हैं। इसी वजह से यह पर्व ग्रामीण जीवन और प्राकृतिक परिवेश से गहराई से जुड़ा हुआ है।29 अगस्त को मनाया जाने वाला कजलियां पर्व प्रकृति, परंपरा, आपसी स्नेह और लोक संस्कृति का ऐसा उत्सव है जो लंबे समय से लोगों के बीच अपनत्व और भाईचारे की भावना को मजबूत करता आया है।

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