श्रावणी पूर्णिमा पर्व पर जनेऊ बदलने की परंपरा

श्रावणी पूर्णिमा पर्व पर जनेऊ बदलने की परंपरा

भोपाल [महामीडिया] 

श्रावणी पूर्णिमा पर्व केवल राखी बांधने तक सीमित नहीं है। इस तिथि पर ब्राह्मण परिवारों के सदस्य यज्ञोपवीत यानी जनेऊ बदलते हैं। इस दिन नया जनेऊ धारण करने की परंपरा है। इस प्रक्रिया को श्रावणी उपाकर्म कहते हैं। मान्यता है कि यह केवल धागा बदलने की परंपरा नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों, संस्कारों और आत्मशुद्धि बनाए रखने का संकल्प लेने का दिन है।शास्त्रों में मनुष्य जीवन के 16 संस्कार बताए गए हैं। इनमें उपनयन संस्कार का विशेष महत्व है। इसी संस्कार में बालक को यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। जनेऊ को यज्ञोपवीत भी कहा जाता है और इसका संबंध यज्ञ, अध्ययन और आध्यात्मिक अनुशासन से है। यज्ञोपवित धारण करने को व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत माना जाता है। पहला जन्म माता-पिता से मिलता है जबकि उपनयन संस्कार के बाद व्यक्ति को ज्ञान और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए दूसरा जन्म मिलता है।

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