माँ शारदा धाम मैहर
मैहर [ महा मीडिया ]
मैहर शक्ति पीठ मध्य प्रदेश के मैहर जिले में त्रिकूट पर्वत पर स्थित मां शारदा देवी का एक प्रसिद्ध और पवित्र शक्तिपीठ है। पौराणिक कथा के अनुसार, यहां माता सती का हार गिरा था, जिससे इस स्थान का नाम 'माई का हार' यानी 'मैहर' पड़ा। मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 1063 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं और भक्तों के लिए रोपे-वे की सुविधा भी उपलब्ध है। ऐसा विश्वास है कि अमर योद्धा आल्हा और ऊदल ने सबसे पहले इस मंदिर की खोज की थी और आल्हा आज भी ब्रह्म मुहूर्त में सबसे पहले पूजा करने आते हैं। मैहर में माता शारदा के वर्तमान मंदिर की स्थापना सन् 502 में हुई थी। मैहर के इस पवित्र मंदिर में जगत माता शारदाम्बिका की उपासना की जाती है। इसे मध्य भारत का श्रृंगेरी मठ भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ विराजित माता शारदाम्बिका श्रृंगेरी की पूज्य देवी का ही रूप मानी जाती हैं। साथ ही श्रृंगेरी मठ की पूजा पद्धति के अनुसार ही यहाँ भी तीन प्रहर की पूजा होती है। स्थानीय विद्वानों और मंदिर से जुड़े लोगों का मानना है कि आदि शंकराचार्य ने मैहर में सबसे पहले माता शारदा की विशेष पूजा की थी। माता शारदाम्बिका, महासरस्वती की अवतार स्वरूप हैं जो पृथ्वी पर सनातन धर्म की स्थापना में आदि शंकराचार्य की सहायता के लिए आई थीं। उत्तर भारत में जो लोग श्रृंगेरी मठ तक नहीं जा सकते उनके लिए मैहर का माता शारदा मंदिर ही महान तीर्थ है। दो मुख्य नवरात्रि के अलावा गुप्त नवरात्रि को भी यहाँ का विशेष त्यौहार माना जाता है। नवरात्रि में मध्य-भारत के अलग-अलग स्थानों से लोग माता शारदाम्बिका के दर्शन के लिए मैहर आते हैं। नवरात्रि पर्व का प्रारम्भ महाअभिषेक से होता है। इसके बाद चार दिन तक लक्षार्चन एवं देवी माहात्म्य परायण होता है। अंत में नवमी के दिन शत चंडी यज्ञ एवं विद्यारंभ की पूजा होती है। इन नौ दिनों के दौरान माता शारदाम्बिका की उपासना महाकाली, ब्राह्मी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, इन्द्राणी, चामुण्डेश्वरी एवं गजलक्ष्मी के रूप में होती है। मंदिर परिसर माता शारदाम्बिका के अतिरिक्त काल भैरव, बाल गणेश, हनुमान, ब्रह्मा आदि देवों की प्रतिमाएँ स्थापित हैं, जिनकी उपासना का विशेष महत्व है।आल्हा और ऊदल दो भाई थे जो चंदेल राजा परमाल के सेनापति थे। दोनों ही माता शारदा के अनन्य भक्त थे। कहा जाता है कि आल्हा ने लगभग 12 वर्ष की तपस्या की जिससे उन्हें माता शारदा के दर्शन प्राप्त हुए और अमरत्व का वरदान मिला। मैहर के मुख्य परिसर से लगभग 2 किमी की दूरी पर आल्हा का मंदिर, तालाब एवं अखाड़ा है। इसी अखाड़े में आल्हा और ऊदल कुश्ती लड़ा करते थे।