बाल अधिकारों के त्वरित न्याय का मार्ग प्रशस्त

बाल अधिकारों के त्वरित न्याय का मार्ग प्रशस्त

भोपाल [ महा मीडिया] बच्चे की अभिरक्षा और संरक्षकता से जुड़े मामलों में अदालत का मुख्य ध्यान माता-पिता के अधिकारों पर नहीं बल्कि बच्चे के हित और कल्याण पर होना चाहिए। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय कानून में ज्वाइंट पेरेंटिंग की कोई स्वतंत्र कानूनी मान्यता नहीं है। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए बांद्रा फैमिली कोर्ट का वह आदेश रद्द किया जिसमें एक दंपती के 14 वर्षीय बच्चे के लिए दोनों माता-पिता के बीच 50-50 प्रतिशत समय के आधार पर साझा अभिरक्षा की व्यवस्था तय की गई थी। जस्टिस गौरी गोडसे ने कहा कि भारत में बच्चे की अभिरक्षा और संरक्षकता से जुड़े कानून ज्वाइंट पेरेंटिंग की अवधारणा को मान्यता नहीं देते। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून का आधार माता-पिता के समान अधिकार सुनिश्चित करना नहीं बल्कि नाबालिग बच्चे का कल्याण है। अदालत ने कहा कि माता-पिता के कानूनी अधिकार बच्चे के हित से ऊपर नहीं हो सकते।
 

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