WWF की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट में वन्यजीव की संख्या में भारी गिरावट

WWF की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट में वन्यजीव की संख्या में भारी गिरावट

भोपाल [ महा मीडिया] डब्ल्यूडब्ल्यूएफ [वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर ] की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट ने वन्यजीव आबादी में भारी गिरावट को रेखांकित किया है ।डब्ल्यूडब्ल्यूएफ [WWF] की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2026 के अनुसार 52 साल की अवधि (1970-2022) में मॉनिटर की गई वन्यजीव आबादी के औसत आकार में 73% की भारी गिरावट आई है। साथ ही, रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि अगर समाज ऊर्जा, भोजन और वित्त प्रणालियों में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए स्पष्ट रास्ते अपनाता है तो प्रकृति फिर से उबर सकती है। ज़ूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ़ लंदन द्वारा तैयार किए गए लिविंग प्लैनेट इंडेक्स (LPI) में 1970 से 2022 तक 5,790 रीढ़धारी (वर्टेब्रेट) प्रजातियों की 35,803 आबादी के रुझान शामिल हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि सबसे ज़्यादा गिरावट मीठे पानी के इकोसिस्टम (-85%) में देखी गई है, इसके बाद ज़मीनी (-69%) और फिर समुद्री (-59%) इकोसिस्टम का नंबर आता है। 
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि निगरानी की जा रही जंगली जानवरों की आबादी पर सबसे ज़्यादा असर डालने वाला खतरा उनके रहने की जगह (हैबिटैट) का नुकसान और उसका खराब होना है इसके बाद ज़रूरत से ज़्यादा दोहन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, बाहरी प्रजातियों का फैलना और बीमारियाँ जैसे खतरे आते हैं। ये खतरे असल में भोजन, ऊर्जा और फाइनेंस सिस्टम में बड़ी स्तर की कमियों की वजह से पैदा होते हैं।
इस रिपोर्ट में हरे कछुओं, ब्लूफ़िन टूना, बाघों और दक्षिणी अफ़्रीकी हाथियों की आबादी में सुधार का ज़िक्र है जो यह दिखाते हैं कि खास तौर पर किए गए संरक्षण के उपाय अच्छे नतीजे दे सकते हैं।2010 और 2025 के बीच दुनिया भर में जंगली बाघों की संख्या में बढ़ोतरी हुई  यह संख्या 3,200 से बढ़कर लगभग 5,700 हो गई। बाघों की संख्या में यह सुधार दिखाता है कि सरकारों, मूल निवासियों, स्थानीय समुदायों,  दान देने वालों और दूसरे सहयोगियों के आपसी तालमेल, लंबे समय के निवेश और सामूहिक प्रयासों से क्या हासिल किया जा सकता है। इसमें राष्ट्रीय बाघ संरक्षण योजनाएँ, सरकारों के बीच समझौते,  संरक्षित इलाकों का विस्तार, समुदाय की भागीदारी और सीमाओं के पार तस्करी रोकने का काम शामिल है। 
भारत में जिन दूसरी प्रजातियों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है उनमें एक सींग वाला गैंडा (मौजूदा आबादी 3,300 से ज़्यादा), आम तेंदुआ (13,874), एशियाई शेर (2020 में 674 से बढ़कर 2025 में 891) और हिम तेंदुआ (718) शामिल हैं। वन्यजीवों की आबादी बढ़ने का यह ट्रेंड भारत की जलीय जैव-विविधता का व्यवस्थित रूप से आकलन और संरक्षण करने की कोशिशों में भी दिखता है। भारत में नदी डॉल्फ़िन की आबादी का पहला व्यापक आकलन 2021-23 के दौरान किया गया, जिसमें 28 नदियों के 8,507 किलोमीटर के दायरे को शामिल किया गया। इस आकलन से गंगा नदी डॉल्फ़िन की आबादी का पहला विज्ञान-आधारित अनुमान (6,324 डॉल्फ़िन) लगाने में मदद मिली।
हालांकि जैव-विविधता के दूसरे संकेतकों में दर्ज गिरावट को सिर्फ़ संरक्षण की कोशिशों से नहीं पलटा जा सकता। जैव-विविधता अर्थव्यवस्थाओं और समाजों का आधार है, जो भोजन, पानी, साफ़ हवा और दवा जैसी कई चीज़ें और सेवाएँ देती है। प्रकृति के विनाश के लिए मुख्य रूप से तीन सिस्टम ज़िम्मेदार हैं खाद्य प्रणाली  आवास के नुकसान का मुख्य कारण है, ऊर्जा प्रणाली (energy system) जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है और वित्तीय प्रणाली  नुकसानदेह गतिविधियों के लिए पैसा देती है। बड़े और जटिल सिस्टम बदलाव का विरोध कर सकते हैं, लेकिन सकारात्मक बदलाव के लिए ज़रूरी हालात बनाकर उन्हें बेहतर दिशा में बदला जा सकता है। ऊर्जा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव का अहम मोड़ पार कर लिया गया है, और बदलाव तेज़ी से हो रहा है। चूँकि ऊर्जा प्रणाली दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा पैदा करती है इसलिए जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के नुकसान से निपटने के लिए जीवाश्म ईंधन  से हटकर नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ना बहुत ज़रूरी है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रांसपोर्ट सेक्टर तेज़ी से डीकार्बोनाइज़ हो रहा है जिसकी वजह है लागत में कमी और बेहतर बैटरी। छोटे दो-पहिया और तीन-पहिया वाहनों में सबसे तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है खासकर भारत, पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन में। चीन और भारत दोनों ही आर्थिक विकास को बढ़ते फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) की खपत से अलग करने की स्थिति में हैं और भारत चीन से भी तेज़ी से सोलर-पावर्ड इकॉनमी की ओर बढ़ रहा है।
फाइनेंस सिस्टम अभी एक निर्णायक मोड़ तक पहुँचने की शुरुआती अवस्था में है। इस सेक्टर को हानिकारक गतिविधियों के लिए फाइनेंसिंग रोकने, प्रकृति और जलवायु को महत्वपूर्ण जोखिम मानने, रेगुलेटरी निश्चितता बनाने और सालाना US$1.3 ट्रिलियन के बायोडायवर्सिटी फाइनेंसिंग गैप को भरने की दिशा में तेज़ी से काम करने की ज़रूरत है।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सेक्रेटरी जनरल रवि सिंह ने इस रिपोर्ट को जारी करते हुए कहा की "लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2026 बायोडायवर्सिटी संकट के पैमाने की एक गंभीर याद दिलाने वाली रिपोर्ट भी है और उम्मीद का संदेश भी। जहाँ लिविंग प्लैनेट इंडेक्स मॉनिटर की गई वन्यजीव आबादी में भारी गिरावट को उजागर करता है वहीं रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि  गिरावट अपरिहार्य नहीं हैं। प्रजातियों की रिकवरी जिसमें भारत और दुनिया भर में बाघों की संख्या में सुधार शामिल है यह दिखाती है कि लगातार संरक्षण कार्यों, सहयोग और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता से क्या प्राप्तकिया जा सकता है।"

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