संपादकीय
भोपाल [ महा मीडिया] 'महर्षि जी भीतर की शांति का मार्ग कैसे खोजें?' यह प्रश्न प्राय: शिष्य परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी से पूछा करते थे। धीरे-धीरे उन्होंने एक और प्रश्न पूछना प्रारंभ किया- 'जिस शक्ति को मैं बाहर खोज रहा हूँ, क्या उसका कोई अंश मेरे भीतर भी है?' यहीं से मनुष्य की यात्रा बाहर से भीतर की ओर मुड़ती है। वेदों और उपनिषदों की चिंतन परंपरा इसी भीतर की यात्रा को महत्व देती है। वह कहती है, संसार की हर वस्तु परिवर्तित हो रही है। आज जो सुंदर है, कल उसका रूप परिवर्तित हो जाएगा। आज जो सुख दे रहा है, वह सदैव सुख नहीं देगा। धन, पद, प्रतिष्ठा, शरीर, संबंध और परिस्थितियाँ, सब परिवर्तनशील हैं। तो फिर स्थायी सुख कहाँ है? इसका उत्तर संसार छोड़ देने में नहीं है। जीवन से भागना कोई समाधान नहीं। मनुष्य को भोजन चाहिए, घर चाहिए, परिवार चाहिए, धन और सम्मान भी चाहिए। इन आवश्यकताओं को नकारा नहीं जा सकता। समस्या आवश्यकताओं में नहीं, हमारे ऊपर उनके हावी हो जाने में है। पैसा अर्जित करना गलत नहीं है, किंतु पैसे को जीवन का उद्देश्य बना लेना भीतर एक ऐसी भूख को जन्म दे देता है, जिसे कोई संपत्ति शांत नहीं कर सकती। पद पाना गलत नहीं, किंतु पद जाने पर स्वयं को समाप्त मान लेना खतरनाक है। प्रसिद्धी अच्छी लग सकती है, किंतु अपनी प्रसन्नता को दूसरों की प्रशंसा का आसक्त बना देना मनुष्य को भीतर से कमजोर कर देता है। यहीं वेदों की एक सरल सीख सामने आती है- संसार में रहो, किंतु संसार को अपने भीतर मत बसने दो। इसे ही अनासक्ति भाव कहा गया है। अनासक्ति का अर्थ जिम्मेदारियों से भागना नहीं है। इसका अर्थ है, जो कार्य हमारे सामने है, उसे पूरी निष्ठा से करना, किंतु उसके परिणाम को अपनी पूरी प्रसन्नता का आधार न बना लेना। याद रखिए, कर्म हमारे हाथ में है, हर परिणाम नहीं। आज के जीवन में यह बात संभवत: पहले से अधिक आवश्यक है। हम निरंतर तुलना कर रहे हैं, किसकी नौकरी अच्छी है, किसका घर बड़ा है, किसके पास अधिक पैसा है, कौन अधिक लोकप्रिय है? परिणाम? असंतोष बढ़ता जाता है। वेदों की दृष्टि कहती है कि बाहरी जीवन को व्यवस्थित करने के साथ भीतर के मन को समझना भी आवश्यक है। इसीलिए जीवन में ज्ञान और कर्म, दोनों चाहिए। मात्र भौतिक सुखों के पीछे भागते रहना हमें भीतर से खाली कर सकता है, किंतु संसार से पूरी तरह दूर हो जाना जीवन की जिम्मेदारियों से भागना है। सही मार्ग दोनों के बीच संतुलन का है। हमें यह जानने की आवश्यकता है कि दुनिया को परिवर्तित करने की हमारी क्षमता सीमित हो सकती है, किंतु अपने भीतर देखने की यात्रा सदैव हमारे हाथ में है। वेदों की यह सीख आज अधिक प्रासंगिक है। बाहर की दुनिया को जीतने से पहले अपने भीतर की दुनिया को पहचानिए। अगर सभी आनंद की खोज कर रहे हैं, तो लोग एक-दूसरे को इतना दु:ख क्यों दे रहे हैं? ऐसा नहीं है कि पराये ही दु:ख देते हैं, अपने भी देते हैं। अपने ही अधिक दु:ख देते हैं। कभी गणना की है, मित्र कितना दु:ख देते हैं? जिन्हें तुमसे घृणा है, वे तो दु:ख देंगे, स्वाभाविक है, किंतु जो कहते हैं कि तुमसे प्रेम है, उन्होंने कितना दु:ख दिया, इसकी गणना कर रखी है? अगर प्रत्येक व्यक्ति दु:ख दे रहा है, तो यह एक ही बात का प्रमाण है कि प्रत्येक व्यक्ति दु:ख से भरा है। हम वही तो देते हैं, जिससे हम भरे हैं। वही तो हमसे बहता है, जो हमारे भीतर भरा है। नीम के पत्ते अगर कड़वे होते हैं, तो इसी कारण कि कड़वापन उसके भीतर बह रहा है और आम अगर मीठा है, तो इसी कारण कि अमीरस उसके भीतर बह रहा है। हमारे व्यवहार से दूसरों को दु:ख मिलता है, क्योंकि भीतर हमारे कड़वाहट है। हम लाख कहें कि हम प्रेम करते हैं, किंतु प्रेम के नाम पर भी हम दूसरों के जीवन में नरक निर्मित करते हैं और सभी कहते हैं कि हम सुख को खोज रहे हैं। अगर आप सुख चाहते हो, तो कोई भी तो बाधा नहीं है, सुख तो लुट रहा है। सुख तो चारों ओर उपस्थित है। हम सभी ऐसे हैं जैसे सामने गंगा बहती हो और किनारे खड़े हो कहें- मैं प्यासा हूँ। झुको और पान करो। गंगा सदा सामने बहती है। आनंद हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हम जिस भी पल तय कर लेंगे कि आनंदित होना है, उसी क्षण आनंदित हो जायेंगे। यह हमारे रोएँ-रोएँ में समाया हुआ है। देरी का कोई कारण नहीं है। इसकी अनुभूति का सरल उपाय है। परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट का नियमित अभ्यास। 'जीवन आनंद है'।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी - संपादकीय]
- ब्रह्मचारी गिरीश जी
























